
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का हवाला, हाईकोर्ट ने दोहरी सुनवाई से किया इनकार
बिलासपुर। प्रदेश के 23 जिलों की अदालतों में शौचालय और पेयजल सुविधाओं की खराब स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसी विषय पर मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए एक ही मुद्दे पर दो अलग-अलग न्यायालयों में सुनवाई उचित नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस विषय में पहले ही दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं, जिनका पालन सुनिश्चित किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ और दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता प्रवीण वारे ने यह जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि राज्य के सभी 23 जिला न्यायालयों एवं अधीनस्थ अदालतों में शौचालयों और पीने के पानी की स्थिति दयनीय है। विशेष रूप से दिव्यांगजनों, महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग, स्वच्छ और सुलभ शौचालयों की कमी को गंभीर समस्या बताया गया।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि रायपुर जिला न्यायालय में साफ-सफाई और रखरखाव से जुड़ा कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में निरीक्षण और मेंटेनेंस से संबंधित दस्तावेजों के अभाव की पुष्टि हुई थी। इसके आधार पर कोर्ट परिसरों में जल गुणवत्ता की जांच, बायो-टॉयलेट, सैनिटरी पैड डिस्पेंसर की व्यवस्था और एक प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की मांग की गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन ने अदालत को बताया कि ‘राजीब कलिता बनाम भारत सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही देशभर की अदालतों के लिए विस्तृत और सख्त निर्देश जारी कर चुका है। इन निर्देशों के तहत प्रत्येक हाईकोर्ट में एक विशेष समिति गठित करने का आदेश दिया गया है, जिसमें न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे। यह समिति अदालत परिसरों में बुनियादी सुविधाओं की नियमित निगरानी करेगी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन की प्रक्रिया जारी है और समान मुद्दे पर पुनः हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।




